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हिमाचल ! इस समय विश्व के लगभग सभी देश चाहे वह विकसित हो या विकासशील कोरोना संक्रमण की चपेट में है। विभिन्न देशों की सरकारे अपने -अपने स्तर पर कोरोना रूपी दुश्मन से लड़ाई में जुटी है। कुछ देश इस लड़ाई में सफल हुए हैं, कुछ अभी भी इस लडाई से जूझ रहे हैं और कब तक जूझते रहेंगे इसकी परिकल्पना करना कठिन है। इस तरह की परिस्थिति से निपटने का विश्व की किसी भी सरकार के पास कोई अनुभव नहीं है क्योंकि लड़ाई एक निर्जीव, सूक्ष्म, विषाणुु के साथ है। दुनिया भर के विख्यात वैज्ञानिकों, शोधकरताओ को इस इस विषाणु ने दांतों चने चबाने पे मजबूर कर दिया है। दुनिया भर में तबाही मचाने के बाद विषाणु जब भारत की तरफ आया तो दूसरे देशों की तरह हमारी सरकार ने भी विषाणु के प्रति अपनी लड़ाई शुरू की। लगभग 2 माह तक अर्थव्यवस्था को पिंजरे में कैद करके लॉकडॉन किया गया। समय के चक्र को देखते हुए यह पग आवश्यक भी था । क्योंकि भारत में उस समय ना तो विषाणु से लड़ने के लिए सही इंतजाम थे, न ही पर्याप्त सामग्री। इसी दो माह के लॉकडॉन के बीच भारत ने अपनी टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाया, नई टेस्टिंग किट बनाई, पी पी ई किट का निर्माण किया ,वेंटीलेटर तैयार किये,अस्पतालों का प्रबंधन अच्छे से किया ताकि संक्रमण बढ़ने पर अस्पताल में मरीजों की व्यवस्था की जा सके। परंतु इसी बीच वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्थानों द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किये गए। भारत की अर्थव्यवस्था केरोना आने से पहले ही चरमराई हुई थी। बेरोजगारी पिछले 45 सालों के चरम पर पहुंच गई थी। परंतु महामारी आने के बाद यह खाई और गहरी होती हुई दिखाई दे रही है। अब सरकार के पास दो ही रास्ते बचे थे अर्थव्यवस्था को बचाया जाए या संक्रमण को रोका जाए। अतः सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का रास्ता चुना तथा अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की क्योंकि वैश्विक संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर जो चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए उनके अनुसार जनता संक्रमण से प्रभावित हो या न हो परंतु गरीबी , भुखमरी, बेरोजगारी से जरूर प्रभावित होगी। जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई भारत में कोरोना संक्रमण के मामले भी तीव्र गति से बनना शुरू हुए 1 दिन में जहां लाकडॉउन के समय 300 मामले सामने आ रहे थे वहीं अनलॉक होने पर यह आंकडा 40000 को छू रहा है। लोगों में भी सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। संक्रमण के खतरे से बचने के लिए एक बार फिर से लॉकडॉउन की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया है । अब यह बात तो प्रामाणित हो गई है कि लॉकडॉउन से संक्रमण की गति को धीमा जरूर किया जा सकता है परंतु संक्रमण को खत्म नहीं किया जा सकता। बात यदि हिमाचल की करें तो दिन -प्रतिदिन सौ से उपर संक्रमित मामले चिंता का विषय बन चुके हैं। हर जिला से संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं ।लोगों में सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। खतरे को देखते हुए हिमाचल में भी लॉकडाउन करने की मांग उठ रही है ।सरकार ने भी इस विषय में जनता से राय मांगी है तथा 78प्रतिशत के लगभग लोग लॉकडाउन का समर्थन कर रहे हैं। लाकडाउन का मतलब एक बार फिर से पटरी पर आती हुई अर्थव्यवस्था को पिंजरे में कैद करना है। लगभग 2 महीने के लॉकडाउन से प्रदेश की पूरी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है। हिमाचल अर्थव्यवस्था को गति देने वाला पृयटन विभाग, जो हिमाचल के सकल घरेलू उत्पात में 7 प्रतिशत योगदान करता है तथा 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करता है पूरी तरह से ठप पड़ा है। सरकार के राजस्व के सारे स्त्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। वर्ष 2020-21 के लिए राजस्व घाटा 684 करोड़ रुपये लक्षित है जो कि जीएसडीपी का 0.38 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा 7,272 करोड़ रुपये (जीएसडीपी का 4 प्रतिशत ) पर लक्षित है। 2019-20 में, हिमाचल प्रदेश को जीएसडीपी के 2.42 प्रतिशत के राजस्व घाटे का निरीक्षण करने का अनुमान है, क्योंकि बजट लक्ष्य 1.3 प्रतिशत है।लॉकडॉन से यह बात तो तय है कि सरकार का राजकोषीय घाटा अगले(2021-22) वित वर्ष के लिए बहुत ज्यादा बड़ जाएगा। राजकोषीय घाटा किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता । सरकार समाजिक सुरक्षा योजना, सब्सिडी, आधारिक संरचना ,कृषि जैसे कार्यो पर कम खर्च करेगी। तथा घाटा पूरा करने के लिए सरकार को बस किराया बड़ाने जैसे कठोर कदम उठाने पड़ेंगे जिससेआम लोगों की अर्थिकी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। वही दूसरी ओर सरकार कर्ज के बोझ तले दबी जा रही है। यहाँ यह बात भी समझनी होगी कि लाकडाउन के मायने समाज के हर वर्ग के लिए अलग-अलग होते हैं आर्थिक संपूर्ण व्यक्ति के लिए यह कदम प्रशंसा से भरा हो सकता है परंतु एक गरीब, मजदूर ,रिक्शा चालक ,चाय विक्रेता के लिए यह कदम जिंदगी और मौत के बीच जूझने का होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हिमाचल सरकार ने कोरोना काल के बीच ,स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा -निर्देशों के अनुसार पर्यटकों को हिमाचल आने की अनुमति प्रदान की। क्योंकि पर्यटन क्षेत्र से एक चाय वाले से लेकर एक बड़े होटल मालिक तक सभी रोजगार प्राप्त होता है। परंतु दिन प्रतिदिन सक्रमण के सौ से ज्यादा मामले सरकार और जनता दोनों के लिए चिंता का सबब बने हैं। अब सवाल यह उठता है कि आगे की राह क्या होनी चाहिए ? लॉकडाउन से संक्रमण नष्ट हो जाने का न तो कोई साक्ष् है न वैज्ञानिक प्रमाण। अब यह समझ लेना अती आवश्यक है कि जान और जहान दोनों को बचाने के लिए सरकार और जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, जहां संक्रमण के मामले आ रहे हैं वहाँ छोटे -छोटे कंटेनमेंट जोन बनाए जाने चाहिए तथा टेस्टिंग को बढ़ाया जाना चाहिए। सामुदायिक संक्रमण संक्रमण को जांचने के लिए रैपिड सेंपलिंग की जानी चाहिए तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा निर्देशों को अच्छे से लागू किया जाना चाहिए, सप्ताह के अंतिम 2 दिन लाकडॉन एक विकल्प हो सकता है । उन देशों के मॉडल को अपनाया जाना चाहिए जिन्होंने कोरोना संक्रमण को नियंत्रण किया! अत: जनता की समझ और सरकार के साथ तालमेल से ही कोरोना संक्रमण को रोका जा सकता है। लापरवाही लाएगी करोना कोहराम ,योद्धा हो हर आदमी तो जीते संग्राम।
हिमाचल ! इस समय विश्व के लगभग सभी देश चाहे वह विकसित हो या विकासशील कोरोना संक्रमण की चपेट में है। विभिन्न देशों की सरकारे अपने -अपने स्तर पर कोरोना रूपी दुश्मन से लड़ाई में जुटी है। कुछ देश इस लड़ाई में सफल हुए हैं, कुछ अभी भी इस लडाई से जूझ रहे हैं और कब तक जूझते रहेंगे इसकी परिकल्पना करना कठिन है। इस तरह की परिस्थिति से निपटने का विश्व की किसी भी सरकार के पास कोई अनुभव नहीं है क्योंकि लड़ाई एक निर्जीव, सूक्ष्म, विषाणुु के साथ है। दुनिया भर के विख्यात वैज्ञानिकों, शोधकरताओ को इस इस विषाणु ने दांतों चने चबाने पे मजबूर कर दिया है।
दुनिया भर में तबाही मचाने के बाद विषाणु जब भारत की तरफ आया तो दूसरे देशों की तरह हमारी सरकार ने भी विषाणु के प्रति अपनी लड़ाई शुरू की। लगभग 2 माह तक अर्थव्यवस्था को पिंजरे में कैद करके लॉकडॉन किया गया। समय के चक्र को देखते हुए यह पग आवश्यक भी था । क्योंकि भारत में उस समय ना तो विषाणु से लड़ने के लिए सही इंतजाम थे, न ही पर्याप्त सामग्री। इसी दो माह के लॉकडॉन के बीच भारत ने अपनी टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाया, नई टेस्टिंग किट बनाई, पी पी ई किट का निर्माण किया ,वेंटीलेटर तैयार किये,अस्पतालों का प्रबंधन अच्छे से किया ताकि संक्रमण बढ़ने पर अस्पताल में मरीजों की व्यवस्था की जा सके।
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परंतु इसी बीच वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्थानों द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किये गए। भारत की अर्थव्यवस्था केरोना आने से पहले ही चरमराई हुई थी। बेरोजगारी पिछले 45 सालों के चरम पर पहुंच गई थी। परंतु महामारी आने के बाद यह खाई और गहरी होती हुई दिखाई दे रही है। अब सरकार के पास दो ही रास्ते बचे थे अर्थव्यवस्था को बचाया जाए या संक्रमण को रोका जाए। अतः सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का रास्ता चुना तथा अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की क्योंकि वैश्विक संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर जो चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए उनके अनुसार जनता संक्रमण से प्रभावित हो या न हो परंतु गरीबी , भुखमरी, बेरोजगारी से जरूर प्रभावित होगी।
जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई भारत में कोरोना संक्रमण के मामले भी तीव्र गति से बनना शुरू हुए 1 दिन में जहां लाकडॉउन के समय 300 मामले सामने आ रहे थे वहीं अनलॉक होने पर यह आंकडा 40000 को छू रहा है। लोगों में भी सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। संक्रमण के खतरे से बचने के लिए एक बार फिर से लॉकडॉउन की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया है । अब यह बात तो प्रामाणित हो गई है कि लॉकडॉउन से संक्रमण की गति को धीमा जरूर किया जा सकता है परंतु संक्रमण को खत्म नहीं किया जा सकता।
बात यदि हिमाचल की करें तो दिन -प्रतिदिन सौ से उपर संक्रमित मामले चिंता का विषय बन चुके हैं। हर जिला से संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं ।लोगों में सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है। खतरे को देखते हुए हिमाचल में भी लॉकडाउन करने की मांग उठ रही है ।सरकार ने भी इस विषय में जनता से राय मांगी है तथा 78प्रतिशत के लगभग लोग लॉकडाउन का समर्थन कर रहे हैं। लाकडाउन का मतलब एक बार फिर से पटरी पर आती हुई अर्थव्यवस्था को पिंजरे में कैद करना है। लगभग 2 महीने के लॉकडाउन से प्रदेश की पूरी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है। हिमाचल अर्थव्यवस्था को गति देने वाला पृयटन विभाग, जो हिमाचल के सकल घरेलू उत्पात में 7 प्रतिशत योगदान करता है तथा 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करता है पूरी तरह से ठप पड़ा है। सरकार के राजस्व के सारे स्त्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। वर्ष 2020-21 के लिए राजस्व घाटा 684 करोड़ रुपये लक्षित है जो कि जीएसडीपी का 0.38 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा 7,272 करोड़ रुपये (जीएसडीपी का 4 प्रतिशत ) पर लक्षित है। 2019-20 में, हिमाचल प्रदेश को जीएसडीपी के 2.42 प्रतिशत के राजस्व घाटे का निरीक्षण करने का अनुमान है, क्योंकि बजट लक्ष्य 1.3 प्रतिशत है।लॉकडॉन से यह बात तो तय है कि सरकार का राजकोषीय घाटा अगले(2021-22) वित वर्ष के लिए बहुत ज्यादा बड़ जाएगा। राजकोषीय घाटा किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता । सरकार समाजिक सुरक्षा योजना, सब्सिडी, आधारिक संरचना ,कृषि जैसे कार्यो पर कम खर्च करेगी। तथा घाटा पूरा करने के लिए सरकार को बस किराया बड़ाने जैसे कठोर कदम उठाने पड़ेंगे जिससेआम लोगों की अर्थिकी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। वही दूसरी ओर सरकार कर्ज के बोझ तले दबी जा रही है।
यहाँ यह बात भी समझनी होगी कि लाकडाउन के मायने समाज के हर वर्ग के लिए अलग-अलग होते हैं आर्थिक संपूर्ण व्यक्ति के लिए यह कदम प्रशंसा से भरा हो सकता है परंतु एक गरीब, मजदूर ,रिक्शा चालक ,चाय विक्रेता के लिए यह कदम जिंदगी और मौत के बीच जूझने का होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हिमाचल सरकार ने कोरोना काल के बीच ,स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा -निर्देशों के अनुसार पर्यटकों को हिमाचल आने की अनुमति प्रदान की। क्योंकि पर्यटन क्षेत्र से एक चाय वाले से लेकर एक बड़े होटल मालिक तक सभी रोजगार प्राप्त होता है। परंतु दिन प्रतिदिन सक्रमण के सौ से ज्यादा मामले सरकार और जनता दोनों के लिए चिंता का सबब बने हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आगे की राह क्या होनी चाहिए ? लॉकडाउन से संक्रमण नष्ट हो जाने का न तो कोई साक्ष् है न वैज्ञानिक प्रमाण। अब यह समझ लेना अती आवश्यक है कि जान और जहान दोनों को बचाने के लिए सरकार और जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, जहां संक्रमण के मामले आ रहे हैं वहाँ छोटे -छोटे कंटेनमेंट जोन बनाए जाने चाहिए तथा टेस्टिंग को बढ़ाया जाना चाहिए। सामुदायिक संक्रमण संक्रमण को जांचने के लिए रैपिड सेंपलिंग की जानी चाहिए तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा निर्देशों को अच्छे से लागू किया जाना चाहिए, सप्ताह के अंतिम 2 दिन लाकडॉन एक विकल्प हो सकता है । उन देशों के मॉडल को अपनाया जाना चाहिए जिन्होंने कोरोना संक्रमण को नियंत्रण किया! अत: जनता की समझ और सरकार के साथ तालमेल से ही कोरोना संक्रमण को रोका जा सकता है।
लापरवाही लाएगी करोना कोहराम ,योद्धा हो हर आदमी तो जीते संग्राम।
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