बिना परामर्श लागू किए गए ‘इक्विटी रेगुलेशन’ से विश्वविद्यालय परिसरों में तनाव और असंतोष का माहौल – मनीष सरीन
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चम्बा , 29 जनवरी [ शिवानी ] ! डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ता मनीष सरीन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए तथाकथित इक्विटी रेगुलेशन्स पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यह फैसला शिक्षा में न्याय स्थापित करने से ज़्यादा भ्रम, भय और अविश्वास पैदा करने वाला साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियमों का उद्देश्य संतुलन और विश्वास पैदा करना होता है, लेकिन UGC द्वारा बिना किसी व्यापक परामर्श के बनाए गए ये नियम न तो विश्वविद्यालयों से चर्चा के बाद आए हैं और न ही छात्रों व शिक्षकों की राय ली गई है। यह सीधा-सीधा नीतिगत अहंकार और केंद्रीकरण की मानसिकता को दर्शाता है। मनीष सरीन ने कहा, “कांग्रेस पार्टी सामाजिक न्याय और भेदभाव के खिलाफ कड़े कदमों की समर्थक रही है, लेकिन न्याय का मतलब यह नहीं हो सकता कि बिना उचित प्रक्रिया और सुरक्षा प्रावधानों के नियम थोप दिए जाएं। न्याय तब कमजोर पड़ता है जब पारदर्शिता और संतुलन की जगह जल्दबाज़ी ले ले।” उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा संस्थान संवेदनशील सामाजिक स्थल होते हैं, जहां नियम बनाते समय अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। “ऐसे नियम, जो शिकायत की प्रक्रिया को अस्पष्ट बनाते हैं और जिनमें दुरुपयोग रोकने के ठोस प्रावधान नहीं हैं, वे परिसरों में सौहार्द बिगाड़ सकते हैं,” उन्होंने चेताया। सरीन ने सवाल उठाया कि जब पहले से ही देश के छात्र NEET, CUET और अन्य परीक्षाओं की अव्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं, तब UGC का यह कदम छात्रों की समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें और उलझाने वाला है। “हर बार कीमत छात्र क्यों चुकाए और जवाबदेही सिस्टम से क्यों गायब रहती है?” उन्होंने पूछा। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि:UGC के इन नियमों को तुरंत स्थगित किया जाए राज्यों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्र संगठनों से व्यापक परामर्श किया जाएऔर ऐसे संतुलित नियम बनाए जाएं जो भेदभाव के खिलाफ सख्त हों, लेकिन निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से समझौता न करें। अंत में उन्होंने कहा, “शिक्षा प्रयोगशाला नहीं है जहां बिना सोचे-समझे फैसले किए जाएं। युवाओं का भविष्य दांव पर है और कांग्रेस इसे किसी भी कीमत पर खतरे में नहीं पड़ने देगी।
चम्बा , 29 जनवरी [ शिवानी ] ! डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ता मनीष सरीन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए तथाकथित इक्विटी रेगुलेशन्स पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यह फैसला शिक्षा में न्याय स्थापित करने से ज़्यादा भ्रम, भय और अविश्वास पैदा करने वाला साबित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियमों का उद्देश्य संतुलन और विश्वास पैदा करना होता है, लेकिन UGC द्वारा बिना किसी व्यापक परामर्श के बनाए गए ये नियम न तो विश्वविद्यालयों से चर्चा के बाद आए हैं और न ही छात्रों व शिक्षकों की राय ली गई है। यह सीधा-सीधा नीतिगत अहंकार और केंद्रीकरण की मानसिकता को दर्शाता है।
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मनीष सरीन ने कहा, “कांग्रेस पार्टी सामाजिक न्याय और भेदभाव के खिलाफ कड़े कदमों की समर्थक रही है, लेकिन न्याय का मतलब यह नहीं हो सकता कि बिना उचित प्रक्रिया और सुरक्षा प्रावधानों के नियम थोप दिए जाएं। न्याय तब कमजोर पड़ता है जब पारदर्शिता और संतुलन की जगह जल्दबाज़ी ले ले।”
उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा संस्थान संवेदनशील सामाजिक स्थल होते हैं, जहां नियम बनाते समय अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। “ऐसे नियम, जो शिकायत की प्रक्रिया को अस्पष्ट बनाते हैं और जिनमें दुरुपयोग रोकने के ठोस प्रावधान नहीं हैं, वे परिसरों में सौहार्द बिगाड़ सकते हैं,” उन्होंने चेताया।
सरीन ने सवाल उठाया कि जब पहले से ही देश के छात्र NEET, CUET और अन्य परीक्षाओं की अव्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं, तब UGC का यह कदम छात्रों की समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें और उलझाने वाला है। “हर बार कीमत छात्र क्यों चुकाए और जवाबदेही सिस्टम से क्यों गायब रहती है?” उन्होंने पूछा।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि:UGC के इन नियमों को तुरंत स्थगित किया जाए राज्यों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्र संगठनों से व्यापक परामर्श किया जाए
और ऐसे संतुलित नियम बनाए जाएं जो भेदभाव के खिलाफ सख्त हों, लेकिन निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से समझौता न करें।
अंत में उन्होंने कहा, “शिक्षा प्रयोगशाला नहीं है जहां बिना सोचे-समझे फैसले किए जाएं। युवाओं का भविष्य दांव पर है और कांग्रेस इसे किसी भी कीमत पर खतरे में नहीं पड़ने देगी।
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