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होम Khabar Himachal Seभारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की अवधारणा और वर्तमान शिक्षा का स्वरूप : भाग 3 - देवेंद्र धर !
  • खबर हिमाचल से

भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की अवधारणा और वर्तमान शिक्षा का स्वरूप : भाग 3 - देवेंद्र धर !

द्वारा
देवेंद्र धर -
Editorial_writer - अन्य ( अन्य ) - September 21, 2020 @ 10:06 am
0

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औरंगजेब के पतन के बाद मुगल साम्राज्य बिखरता हुआ नजर आ रहा था। उधर ब्रिटानिया सरकार ने दक्षिण एशिया और भारत मैं अपने विस्तार के मंसूबे स्पष्ट कर दिए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका खत्म होती जा रही थी। गोरी सरकार चाह रही थी कि बिखरे हुए भारत को अपने कब्जे में कर अंग्रेजी सत्ता और संस्कृति को स्थापित किया जाए व देश के संसाधनों को लूटा जाये। अंग्रेजों ने जो भी किया वह अपनी सुविधा और सत्ता के लिए किया।अंग्रेजों ने जो शिक्षा व्यवस्था दी भारतीयों दी निसंदेह उनमें उनका स्वार्थ ही नहीं था साथ ही वे चाहते थे कि भारतीयों की एक ऐसी जमात पैदा हो जो अंग्रेजीयत में जीयें, हमारी भाषा को समझें और हमारे लिये बाबू काम करते रहें। उन्होंने भारत के विकास, सभ्यता और संस्कृति को संरक्षण देने के लिए शिक्षा नीति नहीं लाई, वे चाहते थे कि भारतीय उनके अच्छे नौकर बने उनको उनकी भाषा समझे व उस भाषा के माध्यम से गोरे शासक भारत पर राज कर सकें। ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 ई.में बनी और तत्कालीन मुगल बादशाह जहांगीर की अनुमति से व्यापार और सूरत में कारखाने के लगा कर व्यापार शुरू कर दिया। 200 वर्ष के भीतर लगभग पूरे भारत वर्ष को कब्जे में ले लिया। वर्ष 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय सेनाओं का जोरदार विरोध झेलना पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने समझा कि ईस्ट इंडिया कंपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस विद्रोह को संभालने में नाकाम रही है तो 1 जनवरी 1874 को ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग कर दिया गया। यहीं से शुरू हुआ अंग्रेजों द्वारा दी गई शिक्षा नीति का वह स्वरूप जिसे लार्ड मैकाले ने भारत में प्रस्तुत कर दिया। ब्रिटिश भारत में अंग्रेजी का विस्तार करने के लिए ज्यादा दिलचस्पी ले रही थी। अंग्रेजी भाषा में भारतीयों को शिक्षित करना उनकी एक रणनीति का हिस्सा था। उन्हें वफादार भारतीयों की काफी जरूरत थी। 10 जून 1834 को लॉर्ड मेकॉले ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के सदस्य के रूप में भारत में पदार्पण किया। उस समय प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर देश में जबरदस्त विवाद चल रहा था। विलियम बेंटिक ने मैकाले को बंगाल की लोक समीक्षा समिति का अध्यक्ष बना दिया। इस दौरान लॉर्ड ऑकलैंड ने गवर्नर जनरल का पद संभाला और बड़े चतुर्थ से प्राचीन शिक्षा विदों को प्रति वर्ष ₹31000 की राशि देना स्वीकार किया। इस घोषणा से प्रतिवादी प्रसन्न हो गए और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का विरोध करने के लिए चल रहे विवाद का भी अंत हुआ। लॉर्ड मैकाले ने 1934 में जो शिक्षा पद्धति अपनाई वह 1947 स्वतंत्र भारत तक चलती रही। लॉर्ड मेकॉले एक दूरदर्शी प्रशासक था जिन्होंने हिंदू और मुसलमानों की शिक्षा पद्धति अपनाकर उन में अंग्रेजी की जगह बनाई। लॉर्ड मेकॉले ने एक लंबा घोषणा पत्र जारी किया जिसे लागू करने में उसे सफलता भी मिली। लोगों का झुकाव अंग्रेजी, अंग्रेजीयत और अंग्रेजी भाषा की ओर बढ़ गया। सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी जानना आवश्यक हो गया। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मात्र बीसवीं शताब्दी में लॉर्ड मैकाले द्वारा दिया गया उपहार था। और यह ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था की अनुलिपि है। स्कूली शिक्षा का पठन-पाठन क्षेत्रीय भाषाओं में होता था, जबकि उच्च शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती थी। ब्रिटिश सरकार ने कुछ भारतीय स्कूलों को अंशदान देना शुरू कर दिया जो कालांतर में सरकारी वित्त पोषण से संचालित चले स्कूल बने। सरकारी धन देने का मुख्य उद्देश्य उन संस्थाओं को शांत करना था जो अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का विरोध कर रही थीं। ब्रिटिश शिक्षा नीति ने मिशनरी स्कूल खोलना आरंभ कर दिया ताकि अंग्रेजी मजबूती से आगे बढ़े। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी को भारत में बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। सिर्फ कला और भाषाओं पर जोर देते रहे। अंग्रेजी शिक्षा के विकास, विस्तार के लिए अंग्रेजों ने जो काम किया उस पर भारतीय शिक्षा पद्धति ही नहीं बल्कि समाज पर भी प्रभाव पड़ा। एक बात तो स्पष्ट तौर पर माननी पड़ेगी कि मुगलों की शिक्षा नीति से बाहर लाने के लिए अंग्रेजी शिक्षा नीति का बहुत बड़ा योगदान है। लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति निसंदेह तब प्रगतिशील शिक्षा नीति थी, इस शिक्षा नीति ने भारत को एक नई दिशा दी। उस समय यह शिक्षा नीति अपने आप में महत्वपूर्ण शिक्षा नीति कही जा सकती है। स्मरण रहे, कि हम इतिहास के किसी अध्याय की बात नहीं कर रहे। हम शिक्षा नीति की पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास कर रहे हैं की विभिन्न शिक्षा नीतियों विकास की प्रक्रिया से गुजरते हुए आज हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। नीति आयोग देश का पहला शिक्षा नीति आयोग 1964 में डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बना जिसे कोठारी शिक्षा आयोग (1964-66) का जाता है । यह देश का पहला ऐसा शिक्षा आयोग है जिसने अपनी रिपोर्ट में सामाजिक बदलावों को ध्यान रखते हुए सुझाव दिए। इस शिक्षा आयोग ने 23 संस्तुतियां देश के समक्ष प्रस्तुत करीः - -बालक बालिकाओं को विज्ञान गणित की शिक्षा दी जाए वह बालक व बालिकाओं को शिक्षा के समान अवसर दिया जाए। 25% माध्यमिक स्कूलों को व्यवसाई स्कूलों में परिवर्तित किया जाए। -सभी बच्चों को प्राइमरी कक्षाओं में मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए व माध्यमिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं में शिक्षण को प्रोत्साहन दिया जाए। -एक और शख्स से 3 वर्ष तक पूर्व प्रारंभिक शिक्षा दी जाए। -6 वर्ष पूरे होने पर ही पहली शिक्षा में नामांकन किया जाए। -पहली सार्वजनिक शिक्षा 10 वर्ष की विद्यालय शिक्षा पूरी करने के बाद ही हो। -विषय विभाजन कक्षा 9 के बदले कक्षा 10 में हो। -उच्च शिक्षा में 3 या उससे अधिक वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम हो और उसके बाद विभिन्न अवधि के पाठ्यक्रम हों। -माध्यमिक विद्यालय दो प्रकार के होंगे,उच्च विद्यालय और उच्चतर विद्यालय। -कॉमन स्कूल सिस्टम लागू किया जाए तथा स्नातकोत्तर तक की शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। -शिक्षक की आर्थिक सामाजिक और व्यवसायिक स्थिति सुधारने की सिफारिश की गई।सह-शिक्षा पर बल दिया गया डॉक्टर कोठारी एक शिक्षाविद भी थे, जिन्होंने वर्तमान शिक्षा को एक नई दिशा देने का प्रयास किया।डॉ कोठारी उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में अध्यापकों तब को लेकर सुझाव दिए और समाज में बदलाव को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण और ठोस सुझाव प्रस्तुत किये। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 24 जुलाई 1968 को भारत के प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई। यह पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर आधारित थी। सामाजिक, राष्ट्रीय एकता, समाजवादी समाज की स्थापना करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए। इस शिक्षा प्रणाली का आधार 10 + 2 + 3 आधार पर शिक्षा का विकास था। हिंदी का संघ संपर्क भाषा में विकास करना, शिक्षा के समान अवसर देना, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा पर बल देना, नैतिक और सामाजिक मूल्यों पर जोर देना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समायोजित किया गया जो वर्तमान में विद्यमान है। इसी के आधार पर देश में शिक्षा संस्थान स्थापित किए गए। हिंदी को संपर्क भाषा के लिए विकसित करने का संकल्प लिया गया। यद्यपि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास पर बराबर ध्यान दिया गया। क्षेत्रीय भाषा पढ़ना एक विकल्प रखा गया, विशेषकर हिमाचल में उर्दू और संस्कृत के विकल्प चुनने के लिए मुक्त कर दिया गया। इस तरीके से देश में शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ और वर्तमान शिक्षा प्रणाली देश को प्रस्तुत की गई अगर हम गौर से देखें तो तो 1964 में गठित कोठारी आयोग ने देश की शिक्षा नीति के आधार को बनाने के लिए एक मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया व देश की तमाम शिक्षा नीतियां इसी दस्तावेज पर आधारित रही। ऐसा माना जा रहा है 26 जुलाई 2020 को स्वीकृत नई शिक्षा नीति(एन ई पी) का आधार अमेरिकी शिक्षा पद्धति से मिलता जुलता है, बल्कि कुछ अनुखंड तो उसी शिक्षा नीति की प्रतिलिपि है। अमेरिका में सर्वप्रिय और सबसे ज्यादा भाषा बोलने वाले लोग अंग्रेजी हैं, यद्यपि स्पेनिश, चीनी,टगालोग, वेतनामी,फ्रंच, बोलने वाले लोगों की मात्रा भी प्रचुर है। लेकिन संपर्क भाषा अंग्रेजी ही है। अमेरिका की राजभाषा अंग्रेजी स्वीकृत की गई संघीय ढांचे में अंग्रेजी भाषा वन संरक्षण संवर्धन और अंग्रेज़ी का विकास संघीय सरकार का दायित्व है। जाहिर है कि कोई भी व्यवस्था अपने आप में कभी परिपूर्ण नहीं होती। प्रश्न यह रहता है कि आप किसी शिक्षा व्यवस्था को या किसी भी प्रणाली को किस प्रकार और कितनी प्रतिबद्धता के साथ लागू करते हैं व इसके क्या प्रभाव होंगे । लेख का भाग 1 पड़ने के लिए क्लिक करें ! लेख का भाग 2 पड़ने के लिए क्लिक करें !

औरंगजेब के पतन के बाद मुगल साम्राज्य बिखरता हुआ नजर आ रहा था। उधर ब्रिटानिया सरकार ने दक्षिण एशिया और भारत मैं अपने विस्तार के मंसूबे स्पष्ट कर दिए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका खत्म होती जा रही थी। गोरी सरकार चाह रही थी कि बिखरे हुए भारत को अपने कब्जे में कर अंग्रेजी सत्ता और संस्कृति को स्थापित किया जाए व देश के संसाधनों को लूटा जाये। अंग्रेजों ने जो भी किया वह अपनी सुविधा और सत्ता के लिए किया।अंग्रेजों ने जो शिक्षा व्यवस्था दी भारतीयों दी निसंदेह उनमें उनका स्वार्थ ही नहीं था साथ ही वे चाहते थे कि भारतीयों की एक ऐसी जमात पैदा हो जो अंग्रेजीयत में जीयें, हमारी भाषा को समझें और हमारे लिये बाबू काम करते रहें। उन्होंने भारत के विकास, सभ्यता और संस्कृति को संरक्षण देने के लिए शिक्षा नीति नहीं लाई, वे चाहते थे कि भारतीय उनके अच्छे नौकर बने उनको उनकी भाषा समझे व उस भाषा के माध्यम से गोरे शासक भारत पर राज कर सकें। ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 ई.में बनी और तत्कालीन मुगल बादशाह जहांगीर की अनुमति से व्यापार और सूरत में कारखाने के लगा कर व्यापार शुरू कर दिया। 200 वर्ष के भीतर लगभग पूरे भारत वर्ष को कब्जे में ले लिया। वर्ष 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय सेनाओं का जोरदार विरोध झेलना पड़ा।

ब्रिटिश सरकार ने समझा कि ईस्ट इंडिया कंपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस विद्रोह को संभालने में नाकाम रही है तो 1 जनवरी 1874 को ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग कर दिया गया। यहीं से शुरू हुआ अंग्रेजों द्वारा दी गई शिक्षा नीति का वह स्वरूप जिसे लार्ड मैकाले ने भारत में प्रस्तुत कर दिया। ब्रिटिश भारत में अंग्रेजी का विस्तार करने के लिए ज्यादा दिलचस्पी ले रही थी। अंग्रेजी भाषा में भारतीयों को शिक्षित करना उनकी एक रणनीति का हिस्सा था। उन्हें वफादार भारतीयों की काफी जरूरत थी। 10 जून 1834 को लॉर्ड मेकॉले ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के सदस्य के रूप में भारत में पदार्पण किया। उस समय प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर देश में जबरदस्त विवाद चल रहा था। विलियम बेंटिक ने मैकाले को बंगाल की लोक समीक्षा समिति का अध्यक्ष बना दिया। इस दौरान लॉर्ड ऑकलैंड ने गवर्नर जनरल का पद संभाला और बड़े चतुर्थ से प्राचीन शिक्षा विदों को प्रति वर्ष ₹31000 की राशि देना स्वीकार किया। इस घोषणा से प्रतिवादी प्रसन्न हो गए और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का विरोध करने के लिए चल रहे विवाद का भी अंत हुआ।

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लॉर्ड मैकाले ने 1934 में जो शिक्षा पद्धति अपनाई वह 1947 स्वतंत्र भारत तक चलती रही। लॉर्ड मेकॉले एक दूरदर्शी प्रशासक था जिन्होंने हिंदू और मुसलमानों की शिक्षा पद्धति अपनाकर उन में अंग्रेजी की जगह बनाई। लॉर्ड मेकॉले ने एक लंबा घोषणा पत्र जारी किया जिसे लागू करने में उसे सफलता भी मिली। लोगों का झुकाव अंग्रेजी, अंग्रेजीयत और अंग्रेजी भाषा की ओर बढ़ गया। सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी जानना आवश्यक हो गया। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मात्र बीसवीं शताब्दी में लॉर्ड मैकाले द्वारा दिया गया उपहार था। और यह ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था की अनुलिपि है। स्कूली शिक्षा का पठन-पाठन क्षेत्रीय भाषाओं में होता था, जबकि उच्च शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती थी। ब्रिटिश सरकार ने कुछ भारतीय स्कूलों को अंशदान देना शुरू कर दिया जो कालांतर में सरकारी वित्त पोषण से संचालित चले स्कूल बने। सरकारी धन देने का मुख्य उद्देश्य उन संस्थाओं को शांत करना था जो अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का विरोध कर रही थीं। ब्रिटिश शिक्षा नीति ने मिशनरी स्कूल खोलना आरंभ कर दिया ताकि अंग्रेजी मजबूती से आगे बढ़े। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी को भारत में बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। सिर्फ कला और भाषाओं पर जोर देते रहे। अंग्रेजी शिक्षा के विकास, विस्तार के लिए अंग्रेजों ने जो काम किया उस पर भारतीय शिक्षा पद्धति ही नहीं बल्कि समाज पर भी प्रभाव पड़ा। एक बात तो स्पष्ट तौर पर माननी पड़ेगी कि मुगलों की शिक्षा नीति से बाहर लाने के लिए अंग्रेजी शिक्षा नीति का बहुत बड़ा योगदान है। लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति निसंदेह तब प्रगतिशील शिक्षा नीति थी, इस शिक्षा नीति ने भारत को एक नई दिशा दी। उस समय यह शिक्षा नीति अपने आप में महत्वपूर्ण शिक्षा नीति कही जा सकती है। स्मरण रहे, कि हम इतिहास के किसी अध्याय की बात नहीं कर रहे। हम शिक्षा नीति की पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास कर रहे हैं की विभिन्न शिक्षा नीतियों विकास की प्रक्रिया से गुजरते हुए आज हम किस तरफ बढ़ रहे हैं।

नीति आयोग

देश का पहला शिक्षा नीति आयोग 1964 में डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बना जिसे कोठारी शिक्षा आयोग (1964-66) का जाता है । यह देश का पहला ऐसा शिक्षा आयोग है जिसने अपनी रिपोर्ट में सामाजिक बदलावों को ध्यान रखते हुए सुझाव दिए। इस शिक्षा आयोग ने 23 संस्तुतियां देश के समक्ष प्रस्तुत करीः -

-बालक बालिकाओं को विज्ञान गणित की शिक्षा दी जाए वह बालक व बालिकाओं को शिक्षा के समान अवसर दिया जाए। 25% माध्यमिक स्कूलों को व्यवसाई स्कूलों में परिवर्तित किया जाए। -सभी बच्चों को प्राइमरी कक्षाओं में मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए व माध्यमिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं में शिक्षण को प्रोत्साहन दिया जाए। -एक और शख्स से 3 वर्ष तक पूर्व प्रारंभिक शिक्षा दी जाए। -6 वर्ष पूरे होने पर ही पहली शिक्षा में नामांकन किया जाए। -पहली सार्वजनिक शिक्षा 10 वर्ष की विद्यालय शिक्षा पूरी करने के बाद ही हो। -विषय विभाजन कक्षा 9 के बदले कक्षा 10 में हो। -उच्च शिक्षा में 3 या उससे अधिक वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम हो और उसके बाद विभिन्न अवधि के पाठ्यक्रम हों। -माध्यमिक विद्यालय दो प्रकार के होंगे,उच्च विद्यालय और उच्चतर विद्यालय। -कॉमन स्कूल सिस्टम लागू किया जाए तथा स्नातकोत्तर तक की शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। -शिक्षक की आर्थिक सामाजिक और व्यवसायिक स्थिति सुधारने की सिफारिश की गई।सह-शिक्षा पर बल दिया गया

डॉक्टर कोठारी एक शिक्षाविद भी थे, जिन्होंने वर्तमान शिक्षा को एक नई दिशा देने का प्रयास किया।डॉ कोठारी उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में अध्यापकों तब को लेकर सुझाव दिए और समाज में बदलाव को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण और ठोस सुझाव प्रस्तुत किये।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति

24 जुलाई 1968 को भारत के प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई। यह पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर आधारित थी। सामाजिक, राष्ट्रीय एकता, समाजवादी समाज की स्थापना करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए। इस शिक्षा प्रणाली का आधार 10 + 2 + 3 आधार पर शिक्षा का विकास था। हिंदी का संघ संपर्क भाषा में विकास करना, शिक्षा के समान अवसर देना, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा पर बल देना, नैतिक और सामाजिक मूल्यों पर जोर देना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समायोजित किया गया जो वर्तमान में विद्यमान है। इसी के आधार पर देश में शिक्षा संस्थान स्थापित किए गए। हिंदी को संपर्क भाषा के लिए विकसित करने का संकल्प लिया गया। यद्यपि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास पर बराबर ध्यान दिया गया। क्षेत्रीय भाषा पढ़ना एक विकल्प रखा गया, विशेषकर हिमाचल में उर्दू और संस्कृत के विकल्प चुनने के लिए मुक्त कर दिया गया।

इस तरीके से देश में शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ और वर्तमान शिक्षा प्रणाली देश को प्रस्तुत की गई अगर हम गौर से देखें तो तो 1964 में गठित कोठारी आयोग ने देश की शिक्षा नीति के आधार को बनाने के लिए एक मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया व देश की तमाम शिक्षा नीतियां इसी दस्तावेज पर आधारित रही। ऐसा माना जा रहा है 26 जुलाई 2020 को स्वीकृत नई शिक्षा नीति(एन ई पी) का आधार अमेरिकी शिक्षा पद्धति से मिलता जुलता है, बल्कि कुछ अनुखंड तो उसी शिक्षा नीति की प्रतिलिपि है। अमेरिका में सर्वप्रिय और सबसे ज्यादा भाषा बोलने वाले लोग अंग्रेजी हैं, यद्यपि स्पेनिश, चीनी,टगालोग, वेतनामी,फ्रंच, बोलने वाले लोगों की मात्रा भी प्रचुर है। लेकिन संपर्क भाषा अंग्रेजी ही है। अमेरिका की राजभाषा अंग्रेजी स्वीकृत की गई संघीय ढांचे में अंग्रेजी भाषा वन संरक्षण संवर्धन और अंग्रेज़ी का विकास संघीय सरकार का दायित्व है। जाहिर है कि कोई भी व्यवस्था अपने आप में कभी परिपूर्ण नहीं होती। प्रश्न यह रहता है कि आप किसी शिक्षा व्यवस्था को या किसी भी प्रणाली को किस प्रकार और कितनी प्रतिबद्धता के साथ लागू करते हैं व इसके क्या प्रभाव होंगे ।

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Shiwani Jaryal --October 20, 2025 @ 04:46 pm

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चम्बा , अक्तूबर 19 [ शिवानी ] ! राजस्व, बागवानी, जनजातीय विकास एवं जन शिकायत

!! राशिफल 20 अक्टूबर 2025 सोमवार !!

October 20, 2025 @ 07:56 am

सोलन ! परमाणु बैरियर जलकर हुआ राख, कार में आग लगने की वजह से हुआ हादसा !

October 19, 2025 @ 09:13 pm

शिमला ! डॉ राजीव बिंदल ने समस्त देशवासियों को दी दिवाली की शतशत बधाई !

October 19, 2025 @ 07:58 pm

सिरमौर ! त्योहारी सीजन पर आग लगने जैसी घटनाओं को लेकर अग्निशमन विभाग नाहन मुस्तैद !

October 19, 2025 @ 07:11 pm
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