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बिलासपुर, 22 मार्च ! राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेले के अवसर पर स्थापित की गई “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से लोगों को जिला बिलासपुर की प्राचीन संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों न केवल झलक देखने को मिल रही है बल्कि लोग पुरातन जानकारी को हासिल कर पा रहे हैं। “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी में बिलासपुर तथा प्राचीन कहलूर रियासतकाल के समय की लोक संस्कृति की विविध झलकियां आकर्षक ढंग से प्रदर्शित की गई हैं। इसमें बांस से बनी पारंपरिक टोकरियां, मिट्टी से बने बर्तन तथा कच्चे घरों को सजाने के लिए की जाने वाली पारंपरिक चित्रकला को विशेष रूप से दर्शाया गया है। साथ ही, ग्रामीण परिवेश में उत्सवों के दौरान घरों की दीवारों पर की जाने वाली लोक चित्रकला और सजावट को भी सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इसके अतिरिक्त, प्रदर्शनी में बिलासपुर के पारंपरिक विवाह समारोहों के रीति-रिवाजों को भी चित्रों और मॉडलों के माध्यम से दर्शाया गया है, जिससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया है। यहां आने वाले दर्शक न केवल इन परंपराओं को देख रहे हैं, बल्कि उनके महत्व को भी समझ पा रहे हैं। प्रदर्शनी में ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। जिसमें बाबा नाहर सिंह मंदिर सहित बिलासपुर के प्राचीन मंदिरों की झलक प्रस्तुत की गई है। विशेष रूप से उन मंदिरों और धरोहरों को भी प्रदर्शित किया गया है, जो गोविंद सागर झील के निर्माण के बाद जलमग्न हो गए थे। यह पहल दर्शकों को जिले के इतिहास के उस महत्वपूर्ण पहलू से अवगत कराती है, जिसे आज की पीढ़ी प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाती है। प्रदर्शनी का एक अन्य प्रमुख आकर्षण ऋषि व्यास की प्रतिमा है, जिनके नाम पर बिलासपुर का नामकरण हुआ है। इस प्रतिमा के माध्यम से क्षेत्र की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि को दर्शाया गया है, जो दर्शकों के लिए विशेष रुचि का विषय बनी हुई है। इस दौरान प्रदर्शनी का अवलोकन करने वाले आगंतुक सेल्फी लेकर इसे अपनी स्मृतियों में संजो रहे हैं।उपायुक्त राहुल कुमार का कहना है कि “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य मेले में आने वाले लोगों को बिलासपुर के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति, बोली, परंपराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में रू-ब-रू करवाना है। साथ ही, यह प्रयास भी किया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को पहचान सके और इस विरासत को आगे आने वाली पीढ़ियों तक संजोकर रख सके।
“कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी में बिलासपुर तथा प्राचीन कहलूर रियासतकाल के समय की लोक संस्कृति की विविध झलकियां आकर्षक ढंग से प्रदर्शित की गई हैं। इसमें बांस से बनी पारंपरिक टोकरियां, मिट्टी से बने बर्तन तथा कच्चे घरों को सजाने के लिए की जाने वाली पारंपरिक चित्रकला को विशेष रूप से दर्शाया गया है। साथ ही, ग्रामीण परिवेश में उत्सवों के दौरान घरों की दीवारों पर की जाने वाली लोक चित्रकला और सजावट को भी सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
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इसके अतिरिक्त, प्रदर्शनी में बिलासपुर के पारंपरिक विवाह समारोहों के रीति-रिवाजों को भी चित्रों और मॉडलों के माध्यम से दर्शाया गया है, जिससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया है। यहां आने वाले दर्शक न केवल इन परंपराओं को देख रहे हैं, बल्कि उनके महत्व को भी समझ पा रहे हैं।
प्रदर्शनी में ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। जिसमें बाबा नाहर सिंह मंदिर सहित बिलासपुर के प्राचीन मंदिरों की झलक प्रस्तुत की गई है। विशेष रूप से उन मंदिरों और धरोहरों को भी प्रदर्शित किया गया है, जो गोविंद सागर झील के निर्माण के बाद जलमग्न हो गए थे। यह पहल दर्शकों को जिले के इतिहास के उस महत्वपूर्ण पहलू से अवगत कराती है, जिसे आज की पीढ़ी प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाती है।
प्रदर्शनी का एक अन्य प्रमुख आकर्षण ऋषि व्यास की प्रतिमा है, जिनके नाम पर बिलासपुर का नामकरण हुआ है। इस प्रतिमा के माध्यम से क्षेत्र की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि को दर्शाया गया है, जो दर्शकों के लिए विशेष रुचि का विषय बनी हुई है। इस दौरान प्रदर्शनी का अवलोकन करने वाले आगंतुक सेल्फी लेकर इसे अपनी स्मृतियों में संजो रहे हैं।
उपायुक्त राहुल कुमार का कहना है कि “कहलूर दर्शन” प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य मेले में आने वाले लोगों को बिलासपुर के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति, बोली, परंपराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में रू-ब-रू करवाना है। साथ ही, यह प्रयास भी किया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को पहचान सके और इस विरासत को आगे आने वाली पीढ़ियों तक संजोकर रख सके।
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