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चम्बा , 20 मार्च [ विशाल सूद ] ! देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध संस्कृति, मेलों और त्योहारों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं परंपराओं में एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा है ‘ढोलरू लोक गायन’, जो हर साल चैत्र माह के आगमन पर चम्बा जिले में देखने को मिलती है। हर वर्ष जम्मू के बन्नी और बसोहली क्षेत्रों से एक विशेष समुदाय के लोग चंबा पहुंचते हैं और घर-घर जाकर ढोलक की मधुर थाप पर भक्ति गीत गाकर लोगों को चैत्र माह का शुभ संदेश सुनाते हैं जोकि एक महीने तक चलता रहता है। ढोलरू लोक गायन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है। माना जाता है कि चैत्र मास के इस महीने में इन लोगों के मुख से सुने भगवान के यह सुरीले शब्द मनुष्य के हर संकट को टाल देते है। पर अब यह प्राचीन परम्परा समय के बदलते परिवेश में लुप्त हो रही है अतः इसे जीवित रखने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आकर इसका सम्मान और संरक्षण करना होगा। तभी इस ऐतिहासिक परम्परा को जीवित रखा जा सकता है। गले में ढोलक लिए यह वहीं ढोलरू लोक गायक है जोकि पूरा साल भर इसी क्षेत्र महीने का इंतजार करते है और घर घर जाकर क्षेत्र महीना जिसको कि लोग बहुत ही शुभ मानते है अपने मुख से गाकर दूसरों को सुनाते है। यह लोग अक्सर अपने परिवार के साथ ही हर जगह जाते है। ढोलरू गायक बताते हैं कि वे पूरे साल इस महीने का इंतजार करते हैं। पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए वे चंबा आकर लोगों के घरों में गीत गाते हैं। इसके बदले में लोग उन्हें कपड़े, अनाज, मिठाइयां और पैसे भेंट करते हैं, जिससे उनका सालभर का गुजारा चलता है।धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी परंपरा जिसको कि यहां के बुद्धिजीवी लोगों के साथ ग्रंथों के ज्ञाता बताते है कि कुछ मान्यताओं के अनुसार, चैत्र माह का नाम इस विशेष वर्ग के लोगों के मुख से सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना इसी माह में हुई थी। एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस समुदाय ने भगवान शंकर की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया, जिसके बाद उन्हें “मंगलमुखी” होने का वरदान मिला।मान्यता है कि जो व्यक्ति इनके मुख से चैत्र माह का नाम सुनता है, उसका पूरा वर्ष सुख-समृद्धि से व्यतीत होता है। चैत्र संक्रांति के आसपास एक सप्ताह तक ढोलरू गायक गांव और शहरों में भ्रमण करते हैं। ढोलकी की थाप और भक्ति गीतों के साथ वे लोगों का मनोरंजन भी करते हैं और धार्मिक आस्था को जीवित रखते हैं। आधुनिकता के इस दौर में जहां नई पीढ़ी इन परंपराओं से दूर होती जा रही है, वहीं ढोलरू गायन जैसी प्राचीन विरासत धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है। हालांकि, चंबा और कांगड़ा के लोग आज भी इसे गहरी आस्था से जोड़कर देखते हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि ढोलरुओं के मुख से चैत्र माह का नाम सुनना शुभ होता है। यही कारण है कि वे उन्हें सम्मानपूर्वक भेंट देकर इस परंपरा को जीवित रखने में अपना योगदान देते हैं।
चम्बा , 20 मार्च [ विशाल सूद ] ! देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध संस्कृति, मेलों और त्योहारों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं परंपराओं में एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा है ‘ढोलरू लोक गायन’, जो हर साल चैत्र माह के आगमन पर चम्बा जिले में देखने को मिलती है।
हर वर्ष जम्मू के बन्नी और बसोहली क्षेत्रों से एक विशेष समुदाय के लोग चंबा पहुंचते हैं और घर-घर जाकर ढोलक की मधुर थाप पर भक्ति गीत गाकर लोगों को चैत्र माह का शुभ संदेश सुनाते हैं जोकि एक महीने तक चलता रहता है। ढोलरू लोक गायन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है।
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माना जाता है कि चैत्र मास के इस महीने में इन लोगों के मुख से सुने भगवान के यह सुरीले शब्द मनुष्य के हर संकट को टाल देते है। पर अब यह प्राचीन परम्परा समय के बदलते परिवेश में लुप्त हो रही है अतः इसे जीवित रखने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आकर इसका सम्मान और संरक्षण करना होगा। तभी इस ऐतिहासिक परम्परा को जीवित रखा जा सकता है।
गले में ढोलक लिए यह वहीं ढोलरू लोक गायक है जोकि पूरा साल भर इसी क्षेत्र महीने का इंतजार करते है और घर घर जाकर क्षेत्र महीना जिसको कि लोग बहुत ही शुभ मानते है अपने मुख से गाकर दूसरों को सुनाते है। यह लोग अक्सर अपने परिवार के साथ ही हर जगह जाते है।
ढोलरू गायक बताते हैं कि वे पूरे साल इस महीने का इंतजार करते हैं। पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए वे चंबा आकर लोगों के घरों में गीत गाते हैं। इसके बदले में लोग उन्हें कपड़े, अनाज, मिठाइयां और पैसे भेंट करते हैं, जिससे उनका सालभर का गुजारा चलता है।
धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी परंपरा जिसको कि यहां के बुद्धिजीवी लोगों के साथ ग्रंथों के ज्ञाता बताते है कि कुछ मान्यताओं के अनुसार, चैत्र माह का नाम इस विशेष वर्ग के लोगों के मुख से सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना इसी माह में हुई थी। एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस समुदाय ने भगवान शंकर की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया, जिसके बाद उन्हें “मंगलमुखी” होने का वरदान मिला।मान्यता है कि जो व्यक्ति इनके मुख से चैत्र माह का नाम सुनता है, उसका पूरा वर्ष सुख-समृद्धि से व्यतीत होता है।
चैत्र संक्रांति के आसपास एक सप्ताह तक ढोलरू गायक गांव और शहरों में भ्रमण करते हैं। ढोलकी की थाप और भक्ति गीतों के साथ वे लोगों का मनोरंजन भी करते हैं और धार्मिक आस्था को जीवित रखते हैं।
आधुनिकता के इस दौर में जहां नई पीढ़ी इन परंपराओं से दूर होती जा रही है, वहीं ढोलरू गायन जैसी प्राचीन विरासत धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है। हालांकि, चंबा और कांगड़ा के लोग आज भी इसे गहरी आस्था से जोड़कर देखते हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि ढोलरुओं के मुख से चैत्र माह का नाम सुनना शुभ होता है। यही कारण है कि वे उन्हें सम्मानपूर्वक भेंट देकर इस परंपरा को जीवित रखने में अपना योगदान देते हैं।
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