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चम्बा, 20 मार्च [ शिवानी ] ! हुनर वही, कलाकारी वही और परंपरा भी वही, बस अब कलाकार बदल गया है। चम्बा शहर के चमेशनी मोहल्ले की रहने वाली लता ने अपने दिवंगत पिता पूर्ण चन्द की विरासत को संजोते हुए मूर्तिकला की उस परंपरा को फिर से जीवित कर दिया है, जिसके लिए उनके पिता जाने जाते थे। पूर्ण चन्द, जो एक कुशल मूर्तिकार थे, का निधन वर्ष 2017 में हो गया था। उनके जाने के बाद यह कला मानो थम सी गई थी, लेकिन बेटी लता ने पिता के हुनर को जिंदा रखने का संकल्प लिया और उसी राह पर चल पड़ीं। इस वर्ष भी लता ने मां काली की तीन सुंदर मूर्तियां तैयार की हैं, जिन्हें सुल्तानपुर वार्ड के माई का बाग और जुल्हाकड़ी मोहल्ला स्थित मां ज्वाला जी मंदिर में स्थापित किया जाएगा।लता का कहना है कि वह यह कार्य किसी व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए करती हैं। वह हर साल नवरात्रों के अवसर पर ही मां काली की मूर्तियां बनाती हैं। लता ने बताया कि इन मूर्तियों को बनाने में पराली, लाल मिट्टी, प्लास्टर, कच्ची रस्सी, फट्टे, मलमल का कपड़ा और विभिन्न रंगों का उपयोग किया गया है। करीब 10 से 15 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद ये मूर्तियां तैयार हुई हैं। उन्होंने बताया कि जब उनके पिता जीवित थे, तब वह उनके साथ मिलकर मूर्ति निर्माण में हाथ बंटाती थीं। पिता के निधन के बाद उन्होंने यह काम बंद कर दिया था, लेकिन लोगों के आग्रह और पिता की याद ने उन्हें फिर से इस कला की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। आज लता न सिर्फ अपने पिता की यादों को जीवित रख रही हैं, बल्कि चम्बा की पारंपरिक मूर्तिकला को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रही हैं।
चम्बा, 20 मार्च [ शिवानी ] ! हुनर वही, कलाकारी वही और परंपरा भी वही, बस अब कलाकार बदल गया है। चम्बा शहर के चमेशनी मोहल्ले की रहने वाली लता ने अपने दिवंगत पिता पूर्ण चन्द की विरासत को संजोते हुए मूर्तिकला की उस परंपरा को फिर से जीवित कर दिया है, जिसके लिए उनके पिता जाने जाते थे।
पूर्ण चन्द, जो एक कुशल मूर्तिकार थे, का निधन वर्ष 2017 में हो गया था। उनके जाने के बाद यह कला मानो थम सी गई थी, लेकिन बेटी लता ने पिता के हुनर को जिंदा रखने का संकल्प लिया और उसी राह पर चल पड़ीं। इस वर्ष भी लता ने मां काली की तीन सुंदर मूर्तियां तैयार की हैं, जिन्हें सुल्तानपुर वार्ड के माई का बाग और जुल्हाकड़ी मोहल्ला स्थित मां ज्वाला जी मंदिर में स्थापित किया जाएगा।
लता का कहना है कि वह यह कार्य किसी व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए करती हैं। वह हर साल नवरात्रों के अवसर पर ही मां काली की मूर्तियां बनाती हैं।
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लता ने बताया कि इन मूर्तियों को बनाने में पराली, लाल मिट्टी, प्लास्टर, कच्ची रस्सी, फट्टे, मलमल का कपड़ा और विभिन्न रंगों का उपयोग किया गया है। करीब 10 से 15 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद ये मूर्तियां तैयार हुई हैं।
उन्होंने बताया कि जब उनके पिता जीवित थे, तब वह उनके साथ मिलकर मूर्ति निर्माण में हाथ बंटाती थीं। पिता के निधन के बाद उन्होंने यह काम बंद कर दिया था, लेकिन लोगों के आग्रह और पिता की याद ने उन्हें फिर से इस कला की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया।
आज लता न सिर्फ अपने पिता की यादों को जीवित रख रही हैं, बल्कि चम्बा की पारंपरिक मूर्तिकला को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रही हैं।
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