विधानसभा में अगर सुक्खू हमारी बात मानते तो आज कोर्ट में अपमानित नहीं होना पड़ता*
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मंडी , 06 अप्रैल [ विशाल सूद [ विशाल सूद ] ! माननीय उच्च न्यायालय द्वारा डीसी को आरक्षण रोस्टर में 5% का कोटा देने के फैसले का स्वागत करते हुए नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि पंचायत चुनाव को लेकर हर बार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को न्यायालय में मुंह की खानी पड़ रही है, लेकिन वह बार-बार पंचायत चुनाव को किसी न किसी तरह प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। आज माननीय उच्च न्यायालय ने डीसी को आरक्षण रोस्टर में 5% कोटा देने के सरकार के फैसले को खारिज किया और नए सिरे से रोस्टर जारी करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस दिन सरकार ने यह असंवैधानिक कदम उठाया था, उसी दिन हमने विधानसभा परिसर के अंदर प्रदर्शन कर इसे वापस लेने की मांग की थी, अन्यथा कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया था। मुख्यमंत्री और पूरे सदन को हमने स्पष्ट किया था कि सरकार का यह कदम भारत के संविधान के अनुच्छेद 243(डी) का खुला उल्लंघन है। इसलिए सरकार अपने इस असंवैधानिक फैसले को वापस ले और चुनाव को प्रभावित करने की अपनी मंशा से बाज आए। हमने उसी दिन सरकार के फैसले के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी सरकार को बताया था, लेकिन मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही पंचायत चुनाव में खलल डालने का संकल्प लिया है। इसलिए वह न तो संविधान विशेषज्ञों की सुनने को तैयार हैं और न ही संविधान की। कांग्रेस की ना तो नीति संवैधानिक है और ना ही नीयत। इसके बाद भी उनके नेता पूरे देश में घूम-घूमकर संविधान की दुहाई देते हैं और जहां मौका मिलता है, सिर्फ संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं। सरकार बार-बार पंचायत चुनाव में अड़ंगा लगाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह कामयाब नहीं हो पा रही है। जब राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया, तो सरकार ने संबंधित अधिकारियों को दुष्प्रेरित किया। हर कदम पर चुनावी प्रक्रिया की तैयारियों में बाधा डाली। आपदा प्रबंधन कानून लगाकर चुनाव टाल दिया। राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के जबरदस्ती तबादले कर दिए। तबादला भी राज्य चुनाव आयोग को स्वतंत्र दायित्व वाला सचिव देने के बजाय मुख्यमंत्री कार्यालय से संबंधित सेवा विस्तार प्राप्त अधिकारी देने की कोशिश हुई। यहां भी कोर्ट से फटकार मिली। चुनाव समय से कराने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। वहां भी सरकार ने आपदा का हवाला देते हुए चुनाव कराने में असमर्थता जताई, तो माननीय उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल तक हर हाल में चुनाव कराने के आदेश दिए। वहां से मुंह की खाने के बाद सुक्खू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां बहुत तल्ख़ टिप्पणी के साथ 31 मई तक चुनाव कराने के आदेश दिए गए। साथ ही सुक्खू सरकार से पूछा गया कि यदि सरकार आपदा में भी अपने 3 साल के कार्यकाल का जश्न मना सकती है, तो चुनाव क्यों नहीं करवा सकती। इसके बाद सरकार द्वारा असंवैधानिक रूप से किए जा रहे डीलिमिटेशन और इलेक्टोरल रोल को भी माननीय न्यायालय द्वारा खारिज किया जा चुका है।
मंडी , 06 अप्रैल [ विशाल सूद [ विशाल सूद ] ! माननीय उच्च न्यायालय द्वारा डीसी को आरक्षण रोस्टर में 5% का कोटा देने के फैसले का स्वागत करते हुए नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि पंचायत चुनाव को लेकर हर बार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को न्यायालय में मुंह की खानी पड़ रही है, लेकिन वह बार-बार पंचायत चुनाव को किसी न किसी तरह प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
आज माननीय उच्च न्यायालय ने डीसी को आरक्षण रोस्टर में 5% कोटा देने के सरकार के फैसले को खारिज किया और नए सिरे से रोस्टर जारी करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस दिन सरकार ने यह असंवैधानिक कदम उठाया था, उसी दिन हमने विधानसभा परिसर के अंदर प्रदर्शन कर इसे वापस लेने की मांग की थी, अन्यथा कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया था।
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मुख्यमंत्री और पूरे सदन को हमने स्पष्ट किया था कि सरकार का यह कदम भारत के संविधान के अनुच्छेद 243(डी) का खुला उल्लंघन है। इसलिए सरकार अपने इस असंवैधानिक फैसले को वापस ले और चुनाव को प्रभावित करने की अपनी मंशा से बाज आए।
हमने उसी दिन सरकार के फैसले के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी सरकार को बताया था, लेकिन मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही पंचायत चुनाव में खलल डालने का संकल्प लिया है। इसलिए वह न तो संविधान विशेषज्ञों की सुनने को तैयार हैं और न ही संविधान की। कांग्रेस की ना तो नीति संवैधानिक है और ना ही नीयत। इसके बाद भी उनके नेता पूरे देश में घूम-घूमकर संविधान की दुहाई देते हैं और जहां मौका मिलता है, सिर्फ संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं।
सरकार बार-बार पंचायत चुनाव में अड़ंगा लगाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह कामयाब नहीं हो पा रही है। जब राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया, तो सरकार ने संबंधित अधिकारियों को दुष्प्रेरित किया। हर कदम पर चुनावी प्रक्रिया की तैयारियों में बाधा डाली। आपदा प्रबंधन कानून लगाकर चुनाव टाल दिया। राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के जबरदस्ती तबादले कर दिए। तबादला भी राज्य चुनाव आयोग को स्वतंत्र दायित्व वाला सचिव देने के बजाय मुख्यमंत्री कार्यालय से संबंधित सेवा विस्तार प्राप्त अधिकारी देने की कोशिश हुई। यहां भी कोर्ट से फटकार मिली।
चुनाव समय से कराने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। वहां भी सरकार ने आपदा का हवाला देते हुए चुनाव कराने में असमर्थता जताई, तो माननीय उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल तक हर हाल में चुनाव कराने के आदेश दिए। वहां से मुंह की खाने के बाद सुक्खू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां बहुत तल्ख़ टिप्पणी के साथ 31 मई तक चुनाव कराने के आदेश दिए गए।
साथ ही सुक्खू सरकार से पूछा गया कि यदि सरकार आपदा में भी अपने 3 साल के कार्यकाल का जश्न मना सकती है, तो चुनाव क्यों नहीं करवा सकती। इसके बाद सरकार द्वारा असंवैधानिक रूप से किए जा रहे डीलिमिटेशन और इलेक्टोरल रोल को भी माननीय न्यायालय द्वारा खारिज किया जा चुका है।
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