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चम्बा , 29 नवंबर [ शिवानी ] ! चम्बा को प्लीच इंडिया फाउंडेशन और एफडीडी आई हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय सम्मेलन/गोष्ठी आयोजित की गई। जिसका शीर्षक टेल्स विलो द हिल्स था। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय पनही की एतिहासिक परंपरा पर शोध पत्र के माध्यम से प्रकाश डालना था, साथ ही भारतीय पनही पर काम करने वाले कारीगरों की तकनीक को समझना भी था। मानव व डॉ अंजलि वर्मा ने महत्वपूर्ण शोध पत्र मोचडू के नाम से प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने चंबा के विभिन्न कालखंड में प्रयोग किए जाने वाले चप्पलों तथा जूते का विवरण दिया। एतिहासिक्ता के आधार पर गजेटियर तथा चंबा के शासकों के द्वारा विभिन्न कालखंड में कारीगरों को जारी किए गए प्रशस्ति पत्रों को भी माध्यम बनाया। मोचडू चम्बा के गीतों का एक बिंदु भी रहा है। इसे उन्होंने अपने शोध पत्र में 10वीं शताब्दी के रानी सुनयना के गाने के माध्यम से वर्णित किया। इसके साथ ही मानव उन कारीगरों का साक्षात्कार लेने में भी सफल रहा। जिनकी 6 से भी अधिक पीढ़ियां चंबा चप्पल (मोचडू) बनाने में लगी हैं। इनमें से कुछ पीढ़ियां अपने से तीन पीढ़ी पीछे के औजारों का इस्तेमाल करते हुए दिखती हैं। यह महत्वपूर्ण शोध हैदराबाद के इस राष्ट्रीय सेमिनार में अत्यंत सराहनीय प्रयास माना गया तथा कईं शोधकर्ताओं का ध्यान खिंचने में सफल रहा। वर्तमान में मानव बी. एड. प्रथम सत्र का विद्यार्थि है। इससे पहले एम.ए. इतिहास विभाग का विद्यार्थि रहा है। यह शोध डॉ. अंजलि वर्मा जो इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापिका के तौर पर कार्यरत हैं के निर्देशन में तैयार किया गया।
चम्बा , 29 नवंबर [ शिवानी ] ! चम्बा को प्लीच इंडिया फाउंडेशन और एफडीडी आई हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय सम्मेलन/गोष्ठी आयोजित की गई। जिसका शीर्षक टेल्स विलो द हिल्स था। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय पनही की एतिहासिक परंपरा पर शोध पत्र के माध्यम से प्रकाश डालना था, साथ ही भारतीय पनही पर काम करने वाले कारीगरों की तकनीक को समझना भी था।
मानव व डॉ अंजलि वर्मा ने महत्वपूर्ण शोध पत्र मोचडू के नाम से प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने चंबा के विभिन्न कालखंड में प्रयोग किए जाने वाले चप्पलों तथा जूते का विवरण दिया। एतिहासिक्ता के आधार पर गजेटियर तथा चंबा के शासकों के द्वारा विभिन्न कालखंड में कारीगरों को जारी किए गए प्रशस्ति पत्रों को भी माध्यम बनाया।
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मोचडू चम्बा के गीतों का एक बिंदु भी रहा है। इसे उन्होंने अपने शोध पत्र में 10वीं शताब्दी के रानी सुनयना के गाने के माध्यम से वर्णित किया। इसके साथ ही मानव उन कारीगरों का साक्षात्कार लेने में भी सफल रहा। जिनकी 6 से भी अधिक पीढ़ियां चंबा चप्पल (मोचडू) बनाने में लगी हैं। इनमें से कुछ पीढ़ियां अपने से तीन पीढ़ी पीछे के औजारों का इस्तेमाल करते हुए दिखती हैं। यह महत्वपूर्ण शोध हैदराबाद के इस राष्ट्रीय सेमिनार में अत्यंत सराहनीय प्रयास माना गया तथा कईं शोधकर्ताओं का ध्यान खिंचने में सफल रहा।
वर्तमान में मानव बी. एड. प्रथम सत्र का विद्यार्थि है। इससे पहले एम.ए. इतिहास विभाग का विद्यार्थि रहा है। यह शोध डॉ. अंजलि वर्मा जो इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापिका के तौर पर कार्यरत हैं के निर्देशन में तैयार किया गया।
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