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चम्बा ! डलहौज़ी से सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व प्रत्याशी मनीष सरीन ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर करारा हमला बोलते हुए कहा है कि राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाना एक सोची-समझी रणनीति के तहत एक मुखर, ईमानदार और जमीनी नेता को दबाने की कार्रवाई है।सरीन ने कहा कि राघव चड्ढा ने राज्यसभा में हमेशा देश के आम नागरिक के मुद्दों को मजबूती से उठाया और कभी भी खुद को केवल पार्टी की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने संसद में जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, उनमें महंगाई और मध्यम वर्ग पर बढ़ता कर बोझ, संयुक्त आयकर प्रणाली की आवश्यकता, मोबाइल रिचार्ज व्यवस्था के नाम पर आम जनता का आर्थिक शोषण, रिचार्ज समाप्त होते ही इनकमिंग सेवाएं बंद करने का मुद्दा, संचार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग, टोल टैक्स को “कानूनी लूट” करार देना, मिलावटी खाद्य पदार्थों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, गिग वर्कर्स के अधिकार और सुरक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति, महिला गरिमा से जुड़े मुद्दे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में भारत की तैयारी, सैनिकों के हितों की रक्षा, तथा पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे लोकतांत्रिक सुधार शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यही वे मुद्दे हैं जो सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़े हैं — और यही कारण है कि राघव चड्ढा देश की जनता की आवाज़ बनकर उभरे, न कि केवल आम आदमी पार्टी के नेता बनकर।मनीष सरीन ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर अरविन्द केजरीवाल, अब अहंकार में इस कदर डूब चुके हैं कि उन्हें स्वतंत्र सोच रखने वाले और जनता के मुद्दे उठाने वाले नेता स्वीकार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी का यह पुराना इतिहास रहा है कि वह अपने प्रदर्शन करने वाले और ईमानदार कार्यकर्ताओं व नेताओं को समय-समय पर किनारे लगाती रही है।सरीन ने कहा कि पंजाब से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक राघव चड्ढा ने पार्टी को एक सशक्त और प्रभावशाली चेहरा दिया, लेकिन आज उसी नेता के साथ किया गया व्यवहार यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह समाप्त हो चुका है। उन्होंने स्वाती मालीवाल से जुड़े विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि यह घटना भी पार्टी के अंदर असहमति को दबाने और सच को छिपाने की प्रवृत्ति को उजागर करती है।मनीष सरीन ने राघव चड्ढा के उस वक्तव्य का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा — “मैं खामोश किया गया हूँ, पर हारा नहीं हूँ” — और इसे लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने के प्रयास के रूप में बताया। उन्होंने कहा कि राघव चड्ढा को किनारे करना दरअसल उस आवाज़ को दबाने का प्रयास है, जो संसद में आम आदमी के अधिकारों, समस्याओं और भविष्य की बात कर रही थी। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि वे किसी पार्टी के नहीं, बल्कि देश के आम नागरिक के सच्चे प्रतिनिधि हैं — और यही बात पार्टी नेतृत्व को असहज करती है। बयान जारी करते समय मनीष सरीन के साथ राजेश चोभियाल, इच्छा राम टंडन, रजत शर्मा, योगराज महाजन व विशाल सिंह मौजूद रहे।
चम्बा ! डलहौज़ी से सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व प्रत्याशी मनीष सरीन ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर करारा हमला बोलते हुए कहा है कि राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाना एक सोची-समझी रणनीति के तहत एक मुखर, ईमानदार और जमीनी नेता को दबाने की कार्रवाई है।सरीन ने कहा कि राघव चड्ढा ने राज्यसभा में हमेशा देश के आम नागरिक के मुद्दों को मजबूती से उठाया और कभी भी खुद को केवल पार्टी की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने संसद में जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, उनमें महंगाई और मध्यम वर्ग पर बढ़ता कर बोझ, संयुक्त आयकर प्रणाली की आवश्यकता, मोबाइल रिचार्ज व्यवस्था के नाम पर आम जनता का आर्थिक शोषण, रिचार्ज समाप्त होते ही इनकमिंग सेवाएं बंद करने का मुद्दा, संचार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग, टोल टैक्स को “कानूनी लूट” करार देना, मिलावटी खाद्य पदार्थों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, गिग वर्कर्स के अधिकार और सुरक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति, महिला गरिमा से जुड़े मुद्दे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में भारत की तैयारी, सैनिकों के हितों की रक्षा, तथा पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे लोकतांत्रिक सुधार शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यही वे मुद्दे हैं जो सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़े हैं — और यही कारण है कि राघव चड्ढा देश की जनता की आवाज़ बनकर उभरे, न कि केवल आम आदमी पार्टी के नेता बनकर।
मनीष सरीन ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर अरविन्द केजरीवाल, अब अहंकार में इस कदर डूब चुके हैं कि उन्हें स्वतंत्र सोच रखने वाले और जनता के मुद्दे उठाने वाले नेता स्वीकार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी का यह पुराना इतिहास रहा है कि वह अपने प्रदर्शन करने वाले और ईमानदार कार्यकर्ताओं व नेताओं को समय-समय पर किनारे लगाती रही है।
सरीन ने कहा कि पंजाब से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक राघव चड्ढा ने पार्टी को एक सशक्त और प्रभावशाली चेहरा दिया, लेकिन आज उसी नेता के साथ किया गया व्यवहार यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
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उन्होंने स्वाती मालीवाल से जुड़े विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि यह घटना भी पार्टी के अंदर असहमति को दबाने और सच को छिपाने की प्रवृत्ति को उजागर करती है।मनीष सरीन ने राघव चड्ढा के उस वक्तव्य का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा — “मैं खामोश किया गया हूँ, पर हारा नहीं हूँ” — और इसे लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने के प्रयास के रूप में बताया।
उन्होंने कहा कि राघव चड्ढा को किनारे करना दरअसल उस आवाज़ को दबाने का प्रयास है, जो संसद में आम आदमी के अधिकारों, समस्याओं और भविष्य की बात कर रही थी। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि वे किसी पार्टी के नहीं, बल्कि देश के आम नागरिक के सच्चे प्रतिनिधि हैं — और यही बात पार्टी नेतृत्व को असहज करती है। बयान जारी करते समय मनीष सरीन के साथ राजेश चोभियाल, इच्छा राम टंडन, रजत शर्मा, योगराज महाजन व विशाल सिंह मौजूद रहे।
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