सुंदरनगर पॉलिटेक्निक कॉलेज के छात्रों ने रचा इतिहास ऑटोमेटिक सिस्टम और वन-अग्नि नियंत्रण पर टिकी दुनिया की नजरें
- विज्ञापन (Article Top Ad) -
मंडी , 02 अप्रैल [ विशाल सूद ] : हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज (Government Polytechnic College) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के अंतिम वर्ष के छात्रों ने भारत में पहली बार एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसने विज्ञान जगत को हैरान कर दिया है। इन होनहार छात्रों ने 'सोनिक वेव फायर एक्सटिंग्विशर' का सफल मॉडल तैयार किया है, जो बिना पानी, बिना झाग और बिना किसी रसायन के, केवल ध्वनि तरंगों के प्रहार से आग को पल भर में शांत कर देता है। यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि अब तक इस तरह के उन्नत शोध केवल चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और उच्च शिक्षण संस्थानों तक ही सीमित थे। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी इसका स्वदेशी ऑटोमेटिक सिस्टम है। जहाँ एक ओर चीन की एक बड़ी कंपनी ने इस तकनीक के कुछ हिस्सों पर पेटेंट हासिल कर वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ बनाई है, वहीं सुंदरनगर के इन छात्रों ने अपने विशिष्ट कोड और डिजाइन के आधार पर इसे स्वचालित (Automated) बनाने की दिशा में बड़ी सफलता पाई है। यह यंत्र सेंसर के माध्यम से आग की पहचान कर खुद-ब-खुद उसे बुझाने में सक्षम है। छात्रों का अगला लक्ष्य इस तकनीक को फॉरेस्ट फायर (जंगलों की आग) को नियंत्रित करने में उपयोग करना है, जहाँ पारंपरिक संसाधन अक्सर बेअसर साबित होते हैं। पर्यावरण के अनुकूल यह आविष्कार भविष्य की सुरक्षा का आधार बन सकता है। डेटा सेंटर, सर्वर रूम और कीमती लैब में बिजली से लगने वाली आग को बुझाने के लिए यह यंत्र किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि इसमें अवशेष के रूप में कुछ भी नहीं बचता और महंगे उपकरण खराब होने का खतरा भी नहीं रहता। छात्रों की इस टीम ने न केवल अपनी क्षमता साबित की है, बल्कि यह भी दिखाया है कि भारत के डिप्लोमा छात्र भी वैश्विक स्तर के नवाचार कर सकते हैं। अब इस प्रोजेक्ट के पेटेंट और औद्योगिक स्तर पर उत्पादन की तैयारी की जा रही है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है। प्रोजेक्ट लीडर छात्र रजत सिंह ने बताया कि उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग फाइनल ईयर के छात्रों के साथ मिलकर ध्वनि तरंगों पर आधारित यह विशेष अग्निशमन यंत्र तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य उन कीमती इलेक्ट्रिकल उपकरणों को बचाना है, जो पारंपरिक आग बुझाने वाले रसायनों या पानी की वजह से खराब हो जाते हैं। रजत सिंह ने कहा कि मशीन में एक माइक्रो-कंट्रोलर का उपयोग किया गया है, जिसमें एक विशेष कोड फीड किया गया है। यह कोड एक निश्चित फ्रीक्वेंसी की ध्वनि उत्पन्न करता है, जिससे आग बुझ जाती है। यह पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है, क्योंकि इसमें कोई केमिकल नहीं है और इसकी लागत भी मात्र 7 से 8 हजार रुपये के बीच है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे बार-बार रिफिल नहीं करना पड़ता और कम वजन होने के कारण इसे पहाड़ों या जंगलों में लगी आग बुझाने के लिए भी आसानी से ले जाया जा सकता है। विभागाध्यक्ष (HOD) राजेश चौधरी ने छात्रों की इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा कि यह प्रोजेक्ट छठे सेमेस्टर के मेजर प्रोजेक्ट का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्र अभी इस तकनीक को और बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं, ताकि इसे पूरी तरह से स्वचालित बनाया जा सके। विभाग की ओर से छात्रों को हर संभव तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि इस शोध कार्य में आगे जो भी आर्थिक सहायता की आवश्यकता होगी, उसे कॉलेज के स्टूडेंट वेलफेयर फंड के माध्यम से पूरा किया जाएगा। संस्थान का लक्ष्य इस नवाचार को एक सफल व्यावसायिक मॉडल के रूप में विकसित करना है, ताकि इसे समाज के व्यापक हित में उपयोग किया जा सके। वहीं, प्रोजेक्ट के मार्गदर्शक अवनीश पॉल ने इसकी वैश्विक महत्ता और भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस आविष्कार का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है और इसे करोड़ों लोग देख चुके हैं। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए देश के बड़े संस्थानों और आईआईटी से भी संपर्क साधा जा रहा है। अवनीश पॉल ने बताया कि वन विभाग के अधिकारियों ने भी इस प्रोजेक्ट में गहरी रुचि दिखाई है, क्योंकि वर्तमान में जंगलों की आग बुझाने के लिए कोई प्रभावी और पोर्टेबल उपकरण उपलब्ध नहीं है। पेटेंट के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ष 2015 में एक विदेशी विश्वविद्यालय ने मैनुअल सोनिक एक्सटिंग्विशर का पेटेंट लिया था, लेकिन उनके छात्र अब ऑटोमैटिक सोनिक फायर एक्सटिंग्विशर के लिए पेटेंट फाइल करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो सेंसर की मदद से स्वतः आग की पहचान कर कुछ ही सेकंड में उसे बुझा सकेगा।
मंडी , 02 अप्रैल [ विशाल सूद ] : हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज (Government Polytechnic College) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के अंतिम वर्ष के छात्रों ने भारत में पहली बार एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसने विज्ञान जगत को हैरान कर दिया है। इन होनहार छात्रों ने 'सोनिक वेव फायर एक्सटिंग्विशर' का सफल मॉडल तैयार किया है, जो बिना पानी, बिना झाग और बिना किसी रसायन के, केवल ध्वनि तरंगों के प्रहार से आग को पल भर में शांत कर देता है।
यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि अब तक इस तरह के उन्नत शोध केवल चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और उच्च शिक्षण संस्थानों तक ही सीमित थे। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी इसका स्वदेशी ऑटोमेटिक सिस्टम है। जहाँ एक ओर चीन की एक बड़ी कंपनी ने इस तकनीक के कुछ हिस्सों पर पेटेंट हासिल कर वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ बनाई है, वहीं सुंदरनगर के इन छात्रों ने अपने विशिष्ट कोड और डिजाइन के आधार पर इसे स्वचालित (Automated) बनाने की दिशा में बड़ी सफलता पाई है।
- विज्ञापन (Article Inline Ad) -
यह यंत्र सेंसर के माध्यम से आग की पहचान कर खुद-ब-खुद उसे बुझाने में सक्षम है। छात्रों का अगला लक्ष्य इस तकनीक को फॉरेस्ट फायर (जंगलों की आग) को नियंत्रित करने में उपयोग करना है, जहाँ पारंपरिक संसाधन अक्सर बेअसर साबित होते हैं। पर्यावरण के अनुकूल यह आविष्कार भविष्य की सुरक्षा का आधार बन सकता है। डेटा सेंटर, सर्वर रूम और कीमती लैब में बिजली से लगने वाली आग को बुझाने के लिए यह यंत्र किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि इसमें अवशेष के रूप में कुछ भी नहीं बचता और महंगे उपकरण खराब होने का खतरा भी नहीं रहता।
छात्रों की इस टीम ने न केवल अपनी क्षमता साबित की है, बल्कि यह भी दिखाया है कि भारत के डिप्लोमा छात्र भी वैश्विक स्तर के नवाचार कर सकते हैं। अब इस प्रोजेक्ट के पेटेंट और औद्योगिक स्तर पर उत्पादन की तैयारी की जा रही है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।
प्रोजेक्ट लीडर छात्र रजत सिंह ने बताया कि उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग फाइनल ईयर के छात्रों के साथ मिलकर ध्वनि तरंगों पर आधारित यह विशेष अग्निशमन यंत्र तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य उन कीमती इलेक्ट्रिकल उपकरणों को बचाना है, जो पारंपरिक आग बुझाने वाले रसायनों या पानी की वजह से खराब हो जाते हैं। रजत सिंह ने कहा कि मशीन में एक माइक्रो-कंट्रोलर का उपयोग किया गया है, जिसमें एक विशेष कोड फीड किया गया है। यह कोड एक निश्चित फ्रीक्वेंसी की ध्वनि उत्पन्न करता है, जिससे आग बुझ जाती है।
यह पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है, क्योंकि इसमें कोई केमिकल नहीं है और इसकी लागत भी मात्र 7 से 8 हजार रुपये के बीच है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे बार-बार रिफिल नहीं करना पड़ता और कम वजन होने के कारण इसे पहाड़ों या जंगलों में लगी आग बुझाने के लिए भी आसानी से ले जाया जा सकता है।
विभागाध्यक्ष (HOD) राजेश चौधरी ने छात्रों की इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा कि यह प्रोजेक्ट छठे सेमेस्टर के मेजर प्रोजेक्ट का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्र अभी इस तकनीक को और बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं, ताकि इसे पूरी तरह से स्वचालित बनाया जा सके। विभाग की ओर से छात्रों को हर संभव तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि इस शोध कार्य में आगे जो भी आर्थिक सहायता की आवश्यकता होगी, उसे कॉलेज के स्टूडेंट वेलफेयर फंड के माध्यम से पूरा किया जाएगा। संस्थान का लक्ष्य इस नवाचार को एक सफल व्यावसायिक मॉडल के रूप में विकसित करना है, ताकि इसे समाज के व्यापक हित में उपयोग किया जा सके।
वहीं, प्रोजेक्ट के मार्गदर्शक अवनीश पॉल ने इसकी वैश्विक महत्ता और भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस आविष्कार का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है और इसे करोड़ों लोग देख चुके हैं। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए देश के बड़े संस्थानों और आईआईटी से भी संपर्क साधा जा रहा है। अवनीश पॉल ने बताया कि वन विभाग के अधिकारियों ने भी इस प्रोजेक्ट में गहरी रुचि दिखाई है, क्योंकि वर्तमान में जंगलों की आग बुझाने के लिए कोई प्रभावी और पोर्टेबल उपकरण उपलब्ध नहीं है। पेटेंट के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ष 2015 में एक विदेशी विश्वविद्यालय ने मैनुअल सोनिक एक्सटिंग्विशर का पेटेंट लिया था, लेकिन उनके छात्र अब ऑटोमैटिक सोनिक फायर एक्सटिंग्विशर के लिए पेटेंट फाइल करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो सेंसर की मदद से स्वतः आग की पहचान कर कुछ ही सेकंड में उसे बुझा सकेगा।
- विज्ञापन (Article Bottom Ad) -
- विज्ञापन (Sidebar Ad 1) -
- विज्ञापन (Sidebar Ad 2) -
- विज्ञापन (Sidebar Ad 3) -
- विज्ञापन (Sidebar Ad 4) -