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चम्बा ! डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस कार्यकर्ता मनीष सरीन ने केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि आज देश की विदेश नीति और आर्थिक नीति ऐसी स्थिति में पहुँच चुकी है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भी अमेरिका की “अनुमति” लेनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए सीमित और अस्थायी छूट देना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मोदी सरकार की तथाकथित “मजबूत विदेश नीति” और “विश्व गुरु” का दावा केवल प्रचार तक सीमित रह गया है। मनीष सरीन ने कहा कि जिस देश को आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बताया जाता है, वही देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश के फैसले पर निर्भर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र के लिए बेहद चिंताजनक है। सरीन ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने विदेश नीति को केवल प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित कर दिया है। कभी बड़े-बड़े मंचों से “विश्व गुरु” बनने का दावा किया जाता है, तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को मजबूत बताने की कोशिश की जाती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आर्थिक और रणनीतिक फैसलों में भारत की स्वतंत्रता लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ हाल ही में उभरे टैरिफ विवाद और व्यापारिक दबावों का सीधा असर भारतीय किसानों, छोटे व्यापारियों और उद्योगों पर पड़ने वाला है। यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में खुली छूट दी जाती है तो इसका सीधा नुकसान देश के किसानों को होगा। पहले से ही महंगाई, बढ़ती लागत और बाजार की अस्थिरता से जूझ रहे किसानों पर यह एक और आर्थिक बोझ साबित होगा। मनीष सरीन ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने भारत के किसानों और छोटे उद्योगों के हितों की रक्षा करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकने का रास्ता चुना है। उन्होंने कहा कि देश का किसान आज भी अपनी फसलों के उचित दाम और स्थिर बाजार के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि केंद्र सरकार विदेशी दबावों के आगे आर्थिक फैसले ले रही है। सरीन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि, बागवानी और छोटे व्यवसायों पर आधारित है। यदि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और टैरिफ नीतियों के कारण बाजार अस्थिर होता है तो इसका असर सीधे हिमाचल के किसानों और बागवानों पर पड़ेगा। ऐसे समय में केंद्र सरकार की कमजोर आर्थिक और व्यापार नीति उनके लिए और मुश्किलें पैदा कर सकती है। मनीष सरीन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन जमीन पर न तो किसानों की आय दोगुनी हुई और न ही देश की आर्थिक स्वायत्तता मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि विदेश नीति का उद्देश्य देश के हितों की रक्षा करना होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक प्रचार करना। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई संवेदनशील मुद्दों और विवादों ने भी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया है, जिनमें कई चर्चित मामलों और फाइलों को लेकर वैश्विक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सर्वोपरि रखना चाहिए। मनीष सरीन ने कहा कि आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत सच में “विश्व गुरु” बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है या फिर अंतरराष्ट्रीय दबावों के सामने झुकती हुई एक निर्भर अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए कहा कि आखिर क्यों भारत को अपनी ऊर्जा नीति और व्यापार नीति तय करने के लिए किसी दूसरे देश की अनुमति का इंतजार करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि देश की जनता यह जानना चाहती है कि “विश्व गुरु” के दावे करने वाली सरकार आखिर कब देश की आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता को वास्तव में मजबूत करेगी।
चम्बा ! डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस कार्यकर्ता मनीष सरीन ने केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि आज देश की विदेश नीति और आर्थिक नीति ऐसी स्थिति में पहुँच चुकी है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भी अमेरिका की “अनुमति” लेनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए सीमित और अस्थायी छूट देना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मोदी सरकार की तथाकथित “मजबूत विदेश नीति” और “विश्व गुरु” का दावा केवल प्रचार तक सीमित रह गया है।
मनीष सरीन ने कहा कि जिस देश को आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बताया जाता है, वही देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश के फैसले पर निर्भर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र के लिए बेहद चिंताजनक है।
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सरीन ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने विदेश नीति को केवल प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित कर दिया है। कभी बड़े-बड़े मंचों से “विश्व गुरु” बनने का दावा किया जाता है, तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को मजबूत बताने की कोशिश की जाती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आर्थिक और रणनीतिक फैसलों में भारत की स्वतंत्रता लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ हाल ही में उभरे टैरिफ विवाद और व्यापारिक दबावों का सीधा असर भारतीय किसानों, छोटे व्यापारियों और उद्योगों पर पड़ने वाला है। यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में खुली छूट दी जाती है तो इसका सीधा नुकसान देश के किसानों को होगा। पहले से ही महंगाई, बढ़ती लागत और बाजार की अस्थिरता से जूझ रहे किसानों पर यह एक और आर्थिक बोझ साबित होगा।
मनीष सरीन ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने भारत के किसानों और छोटे उद्योगों के हितों की रक्षा करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकने का रास्ता चुना है। उन्होंने कहा कि देश का किसान आज भी अपनी फसलों के उचित दाम और स्थिर बाजार के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि केंद्र सरकार विदेशी दबावों के आगे आर्थिक फैसले ले रही है।
सरीन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि, बागवानी और छोटे व्यवसायों पर आधारित है। यदि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और टैरिफ नीतियों के कारण बाजार अस्थिर होता है तो इसका असर सीधे हिमाचल के किसानों और बागवानों पर पड़ेगा। ऐसे समय में केंद्र सरकार की कमजोर आर्थिक और व्यापार नीति उनके लिए और मुश्किलें पैदा कर सकती है।
मनीष सरीन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन जमीन पर न तो किसानों की आय दोगुनी हुई और न ही देश की आर्थिक स्वायत्तता मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि विदेश नीति का उद्देश्य देश के हितों की रक्षा करना होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक प्रचार करना।
उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई संवेदनशील मुद्दों और विवादों ने भी दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया है, जिनमें कई चर्चित मामलों और फाइलों को लेकर वैश्विक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सर्वोपरि रखना चाहिए।
मनीष सरीन ने कहा कि आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत सच में “विश्व गुरु” बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है या फिर अंतरराष्ट्रीय दबावों के सामने झुकती हुई एक निर्भर अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है।
उन्होंने केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए कहा कि आखिर क्यों भारत को अपनी ऊर्जा नीति और व्यापार नीति तय करने के लिए किसी दूसरे देश की अनुमति का इंतजार करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि देश की जनता यह जानना चाहती है कि “विश्व गुरु” के दावे करने वाली सरकार आखिर कब देश की आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता को वास्तव में मजबूत करेगी।
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